इंदौर।
 मध्य प्रदेश के चर्चित भोजशाला-कमल मौला मस्जिद मामले में बुधवार को इंदौर हाईकोर्ट में तीखी बहस हुई। इस केस में एक पक्षकार के तौर पर शामिल हुए काजी मोइनुद्दीन ने सनसनीखेज दावा किया कि वे मौलाना कमलुद्दीन चिश्ती के सीधे वंशज हैं। उन्होंने कोर्ट के सामने अपनी पूरी वंशावली और रियासतकालीन दस्तावेज पेश करते हुए स्थल के धार्मिक स्वरूप को बदलने की किसी भी कोशिश का विरोध किया।
'हमारे पास है जमीन का रिकॉर्ड'
काजी मोइनुद्दीन के वकील एन.ए. शेख ने जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच को बताया कि उनके मुवक्किल का इस जगह से नाता सदियों पुराना है। उन्होंने धार की तत्कालीन कोर्ट के रिकॉर्ड से निकली एक 'फैमिली ट्री' पेश की। दलील दी गई कि धार के शासकों ने उनके पूर्वजों को पहले 100 बीघा और बाद में 50 बीघा जमीन अनुदान में दी थी।
खसरा नंबर 313 और मालिकाना हक का सवाल
एडवोकेट शेख ने कोर्ट को बताया कि विवादित स्थल, जिसका पुराना खसरा नंबर 313 है, वह उनके मुवक्किल के परिवार को अनुदान में मिला था। उन्होंने तर्क दिया कि दस्तावेजों में इस जमीन पर मस्जिद और अन्य ढांचों की मौजूदगी और परिवार का लगातार शांतिपूर्ण कब्जा दर्ज है।
वाग्देवी नहीं 'अंबिका' की है मूर्ति?
मामले में एक अन्य पक्षकार मौलाना कमलुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की ओर से वकील तौसीफ वारसी ने ASI की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने एक ब्रिटिश हाई कमिश्नर की चिट्ठी का हवाला देते हुए दावा किया कि जिस 'वाग्देवी' की प्रतिमा को लंदन से वापस लाने की बात होती है, वह असल में माता 'अंबिका' की मूर्ति है। वारसी ने आरोप लगाया कि ASI इस मामले में अलग-अलग याचिकाओं पर विरोधाभासी जवाब दाखिल कर रहा है। इस मामले में बहस गुरुवार को भी जारी रहेगी।