छतरपुर। 
उत्तर प्रदेश के कानपुर में फर्जी मार्कशीट और डिग्री बनाने वाले एक बड़े गिरोह का खुलासा हुआ है। कानपुर पुलिस ने किदवई नगर थाना क्षेत्र में कार्रवाई करते हुए 1030 संदिग्ध मार्कशीटें बरामद की हैं। इनमें से 103 मार्कशीटें मध्य प्रदेश के छतरपुर स्थित श्री कृष्णा विश्वविद्यालय के नाम की बताई जा रही हैं। मामले में 19 फरवरी को एफआईआर दर्ज की गई है, जिसकी जांच जारी है।
‘सेल ग्रुप ऑफ एजुकेशन’ के नाम से चल रहा था नेटवर्क
पुलिस के मुताबिक, ‘सेल ग्रुप ऑफ एजुकेशन’ नाम से संचालित एक कथित संस्था विभिन्न विश्वविद्यालयों के नाम पर डिग्रियां और मार्कशीट उपलब्ध कराने का काम कर रही थी। मुखबिर की सूचना पर छापेमारी के दौरान बड़ी संख्या में अलग-अलग विश्वविद्यालयों की मार्कशीटें और दस्तावेज बरामद हुए। पुलिस का दावा है कि गिरोह पैसे लेकर फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र उपलब्ध कराता था।
कई विश्वविद्यालयों के नाम सामने
जांच में जिन संस्थानों के नाम की मार्कशीटें मिलने की बात सामने आई है, उनमें प्रमुख रूप से:
श्री कृष्णा विश्वविद्यालय (छतरपुर, मप्र)

  • लिंगा विश्वविद्यालय
  • मंगलायतन विश्वविद्यालय
  • जेएस विश्वविद्यालय
  • ग्लोकल विश्वविद्यालय
  • सिक्किम प्रोफेशनल विश्वविद्यालय
  • प्रज्ञान विश्वविद्यालय
  • स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय
  • हिमालय गढ़वाल विश्वविद्यालय
  • छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय

पुलिस अब यह जांच कर रही है कि बरामद दस्तावेज असली हैं या संबंधित विश्वविद्यालयों के नाम पर फर्जी तरीके से तैयार किए गए।
चेयरमैन का दावा: “नाम का दुरुपयोग हो सकता है”
श्री कृष्णा विश्वविद्यालय के चेयरमैन डॉ. पुष्पेंद्र गौतम ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि संभव है विश्वविद्यालय के नाम का दुरुपयोग किया गया हो। उनका कहना है कि पूर्व में भी फर्जी डिग्री के मामलों में शिकायत दर्ज कराई जा चुकी है। उन्होंने कहा कि छात्रों का डाटा मिलने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि दस्तावेज असली हैं या फर्जी।
गंभीर धाराओं में केस दर्ज
मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं में प्रकरण दर्ज किया गया है। पुलिस का कहना है कि यह सिर्फ फर्जी डिग्री का मामला नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर आर्थिक अनियमितताओं और संभावित मनी लॉन्ड्रिंग से भी जुड़ा हो सकता है।
शिक्षा व्यवस्था पर सवाल
इस खुलासे के बाद निजी विश्वविद्यालयों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि डिग्रियों की सत्यता पर ही संदेह हो, तो इससे छात्रों के भविष्य और शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता दोनों पर गंभीर असर पड़ता है। फिलहाल जांच एजेंसियां दस्तावेजों की फॉरेंसिक जांच और संबंधित विश्वविद्यालयों से सत्यापन की प्रक्रिया में जुटी हैं। मामले में आगे और खुलासे होने की संभावना जताई जा रही है।