प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का अनोखा अंदाज: 0% वीआईपी कल्चर, 100% सादगी; पार्टी की गाड़ी तक लेने से किया इनकार
भोपाल।
आज के दौर में जहाँ एक छोटा सा पार्षद भी नीली-लाल बत्ती और काफिले के बिना नहीं चलता, वहीं मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के नए प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने अपनी सादगी से सबको चौंका दिया है। सत्ता के केंद्र भोपाल में रहते हुए भी खंडेलवाल ने वह सब लेने से मना कर दिया है जो किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष का 'जन्मसिद्ध अधिकार' माना जाता है।
न बंगला, न नौकर-चाकर, न सरकारी सुरक्षा
अध्यक्ष बनने के बाद आमतौर पर सबसे पहले आलीशान सरकारी बंगले और सुरक्षाकर्मियों की फौज तैयार की जाती है। लेकिन हेमंत खंडेलवाल ने स्पष्ट कर दिया— "मैं जैसा हूँ, वैसा ही रहूँगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और पार्टी के दबाव के बावजूद उन्होंने बंगला नहीं लिया। वे प्रोफेसर कॉलोनी के एक साधारण फ्लैट (लीला हाइट्स) में रह रहे हैं। मिलने-जुलने वालों के लिए उन्होंने फ्लैट के नीचे एक छोटा सा हिस्सा कार्यालय बनाया है। न कोई सरकारी पीए, न कोई चपरासी। ताज्जुब की बात यह है कि वे पार्टी कार्यालय की गाड़ी तक इस्तेमाल नहीं कर रहे। गाड़ी उनकी अपनी है, ड्राइवर को तनख्वाह अपनी जेब से दे रहे हैं और पेट्रोल-डीजल का बिल भी संगठन पर नहीं डाल रहे।
होटल का पानी और ट्रेन की टिकट... सब अपनी जेब से!
हेमंत खंडेलवाल के दौरों के किस्से भी कम दिलचस्प नहीं हैं। बताया जाता है कि जिलों के प्रवास के दौरान यदि वे किसी होटल में ठहरते हैं, तो वहाँ के पानी तक का बिल खुद चुकाते हैं। कार्यकर्ताओं या जिला अध्यक्षों को उन्होंने साफ हिदायत दे रखी है कि उनके निजी खर्च का बोझ संगठन या कार्यकर्ताओं पर न डाला जाए। यहाँ तक कि ट्रेन यात्राओं के टिकट के पैसे भी वे नियमित अंतराल पर कार्यालय में जमा कर देते हैं।
अंधेरे में रहे, पर मंत्री को फोन नहीं किया
उनकी सादगी का सबसे बड़ा उदाहरण हाल ही में देखने को मिला। प्रोफेसर कॉलोनी में बिजली की भारी कटौती से वे परेशान थे, दिन में सात-सात बार लाइट जा रही थी। लेकिन मजाल है कि उन्होंने ऊर्जा मंत्री या बिजली विभाग के किसी अधिकारी को फोन घुमाया हो। वे चुपचाप अपने पैसे से इन्वर्टर या जनरेटर खरीदने की तैयारी कर रहे थे। जब अधिकारियों को किसी और माध्यम से पता चला कि बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बिना बिजली के रह रहे हैं, तब जाकर विभाग की नींद टूटी।
बीजेपी में एक 'अलग मिट्टी' का नेता
हेमंत खंडेलवाल का यह आचरण उन नेताओं के लिए एक बड़ा सबक है जो पद मिलते ही जमीन छोड़ देते हैं। बीजेपी को 'कैडर बेस्ड' पार्टी कहा जाता है, और खंडेलवाल जैसे नेता इस परिभाषा को जीवंत कर रहे हैं। हालांकि राजनीति में 'दिखावे' और 'सादगी' के बीच एक महीन रेखा होती है, लेकिन खंडेलवाल जिस तरह से अपनी जेब से संगठन चला रहे हैं, वह आज की सियासत में दुर्लभ है।

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