भोपाल।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने साल 2026 को "किसान वर्ष" घोषित किया है, लेकिन धरातल पर मध्य प्रदेश का अन्नदाता खून के आंसू रो रहा है। तकनीकी खामियों और सेटेलाइट सर्वे के नाम पर प्रदेश के करीब 80-90 लाख किसानों की फसल की खरीदी अधर में लटक गई है। किसानों का आरोप है कि उन्होंने गेहूं खरीदी के लिए सरकार के पोर्टल पर समय पर रजिस्ट्रेशन कराया, लेकिन जब फसल लेकर मंडी या समिति पहुंचे, तो मोबाइल पर मैसेज आता है— "सेटेलाइट सत्यापन फेल हो गया।" अब किसानों को तहसीलदार, पटवारी और आरआई के चक्कर काटने को मजबूर किया जा रहा है। झाबुआ जैसे जिलों में आक्रोश इतना बढ़ गया है कि किसानों ने सड़क पर गेहूं बिछाकर अपना विरोध दर्ज कराया है।
शायर मंजर भोपाली की ज़बानी, किसानों की परेशानी
विश्वविख्यात शायर मंजर भोपाली, जो खुद एक छोटे किसान भी हैं, इस व्यवस्था का शिकार हुए हैं। उनकी मार्मिक अपील ने सरकार की नीतियों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं:
"जरा सा दस्ते तावुन जो तुम बढ़ा देते, तो अन्नदाता कभी खुदकुशी नहीं करते।"
मंजर भोपाली ने बताया कि फरवरी में रजिस्ट्रेशन के बावजूद 3 अप्रैल को उनकी ट्रॉली वापस कर दी गई। उन्होंने मुख्यमंत्री से सीधा सवाल किया:
"चेहरे की मुस्कान छीन ली गई:" जब एमएसपी ₹2625 है, तो किसान ₹1800-2000 में निजी हाथों में फसल बेचने को क्यों मजबूर है? "अधिकारियों की मनमानी:" क्या सरकार को पता है कि उसके अधिकारी और तकनीकी सिस्टम किसान वर्ष को विफल बना रहे हैं?
एमएसपी का वादा और मंडी का कड़वा सच
सरकार ने गेहूं खरीदी का जो वादा किया था, वह 'सत्यापन फेल' होने की वजह से दम तोड़ रहा है। किसान परेशान है कि वह अपने बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की दवा और घर का खर्च कैसे चलाए। यदि सरकार ने तत्काल प्रभाव से इन तकनीकी खामियों को दूर नहीं किया, तो प्रदेश का किसान आंदोलन की राह पर होगा।