बाबा साहब अम्बेडकर की विरासत को संजोती भाजपा
(14 अप्रैल जयंती पर विशेष)
भारत के इतिहास में ऐसे महान व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने अपने विचारों, संघर्ष और कार्यों से समाज की दिशा बदल दी। डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ऐसे ही महान पुरुष थे। वे न केवल भारतीय संविधान के निर्माता थे, बल्कि सामाजिक समानता, न्याय और मानव अधिकारों के प्रबल समर्थक भी थे। उनका जीवन संघर्ष, ज्ञान और परिवर्तन का अद्भुत उदाहरण है। बचपन से ही उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने धैर्य रखा और जीवन की गति में प्रगति करते रहे। शिक्षा को उन्होंने जीवन श्रेष्ठ बनाने का माध्यम माना उन्होंने यह स्पष्ट रूप से कहा कि “शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो”। यह उनका प्रसिद्ध नारा था, जिसने लाखों लोगों को प्रेरित किया। उनका मानना था कि सामाजिक बदलाव के लिए शिक्षा सबसे जरूरी है।
स्वतंत्र भारत के निर्माण में डॉ. अंबेडकर की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उन्हें संविधान सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। उनके नेतृत्व में भारत का संविधान तैयार हुआ, जो समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित है।
भारतीय संविधान में उन्होंने सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए और छुआछूत जैसी कुप्रथा को समाप्त करने के लिए कानूनी प्रावधान किए। वे भारत के पहले कानून मंत्री भी बने। उनके प्रयासों से महिलाओं और कमजोर वर्गों को भी अधिकार मिले। डॉ. अंबेडकर ने संविधान में समानता (Equality) को विशेष महत्व दिया। उन्होंने सुनिश्चित किया कि सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समान अधिकार प्राप्त हों। उनके प्रयासों से संविधान में मौलिक अधिकारों को शामिल किया गया, विशेष रूप से उन्होंने अस्पृश्यता (Untouchability) को समाप्त करने के लिए अनुच्छेद 17 का प्रावधान किया, जो एक ऐतिहासिक कदम था।
डॉ. अंबेडकर सामाजिक न्याय के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था का समर्थन किया, ताकि उन्हें शिक्षा, रोजगार और राजनीति में समान अवसर मिल सके। यह उनके सामाजिक सुधार के दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण हिस्सा था। उन्होंने भारत को एक संघीय (Federal) ढांचे के साथ संसदीय लोकतंत्र देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का संतुलन बनाए रखने के लिए उन्होंने स्पष्ट प्रावधान किए।
उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि भारत में जनता द्वारा चुनी गई सरकार हो, और शासन जनता के प्रति उत्तरदायी रहे। डॉ. अंबेडकर ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाया, ताकि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हो सके।
उन्होंने महिलाओं के अधिकारों को भी संविधान में स्थान दिलाया। समानता, संपत्ति के अधिकार और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर उन्होंने विशेष ध्यान दिया। वे महिलाओं के सशक्तिकरण के समर्थक थे।
उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सभी धर्मों को समान सम्मान मिले और किसी भी नागरिक के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव न हो। उनकी दूरदृष्टि के कारण भारतीय संविधान में लचीलापन (Flexibility) और कठोरता (Rigidity) दोनों का संतुलन रखा गया। उन्होंने संविधान को ऐसा बनाया जो समय के साथ बदलती परिस्थितियों के अनुसार संशोधित किया जा सके। डॉ. भीमराव अंबेडकर का योगदान केवल एक विधिवेत्ता के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक सुधारक और राष्ट्रनिर्माता के रूप में भी था। उन्होंने संविधान के माध्यम से एक ऐसे भारत की नींव रखी, जहाँ समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के आदर्श स्थापित हों। बाबा साहब अम्बेडकर का योगदान केवल संविधान निर्माण तक सीमित नहीं था, बल्कि भारत की आर्थिक और वित्तीय व्यवस्था के विकास में भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। Reserve Bank of India (भारतीय रिज़र्व बैंक) की स्थापना में उनके विचारों और शोध का गहरा प्रभाव माना जाता है।
बाबा साहब अम्बेडकर ने जवाहर लाल नेहरू जी के मंत्रिमंडल से 1951 में इस्तीफा दिया। उनका यह निर्णय अचानक नहीं था, बल्कि कई गहरे वैचारिक मतभेदों और असंतोष का परिणाम था। डॉ. अंबेडकर के इस्तीफे का सबसे बड़ा कारण हिंदू कोड बिल था। यह बिल महिलाओं को संपत्ति, विवाह, तलाक और उत्तराधिकार में समान अधिकार देने के लिए बनाया गया था। डॉ. अंबेडकर चाहते थे कि यह बिल जल्द पारित हो, लेकिन संसद में इसका कड़ा विरोध हुआ और सरकार ने इसे आगे बढ़ाने में रुचि नहीं दिखाई। इससे वे अत्यंत निराश हुए, क्योंकि वे इसे सामाजिक सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम मानते थे। डॉ. अंबेडकर का मानना था कि नेहरू सरकार सामाजिक न्याय और समानता के मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रही है। वे चाहते थे कि दलितों और महिलाओं के अधिकारों को प्राथमिकता दी जाए, लेकिन उन्हें लगा कि सरकार इन मुद्दों को गंभीरता से नहीं ले रही।
डॉ. अंबेडकर के कई मामलों में जवाहरलाल नेहरू जी से मतभेद थे, जैसे आर्थिक नीतियों को लेकर असहमति,कश्मीर नीति पर भिन्न विचार विदेश नीति और प्रशासनिक दृष्टिकोण पर अंतर ,इन मतभेदों के कारण वे स्वयं को सरकार में असहज महसूस करने लगे। कानून मंत्री होने के बावजूद डॉ. अंबेडकर को कई महत्वपूर्ण निर्णयों में पर्याप्त भूमिका नहीं मिल रही थी।इससे उन्हें लगा कि वे अपने विचारों और योजनाओं को प्रभावी रूप से लागू नहीं कर पा रहे हैं। डॉ. अंबेडकर सिद्धांतों के व्यक्ति थे। वे सामाजिक न्याय और समानता के मुद्दों पर किसी भी प्रकार का समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे।जब उन्हें लगा कि उनके मूल उद्देश्यों को पूरा नहीं किया जा रहा है, तो उन्होंने पद छोड़ना उचित समझा। डॉ. भीमराव अंबेडकर का इस्तीफा उनके सिद्धांतों, सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता और सुधारवादी दृष्टिकोण का प्रतीक था। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण उनके लिए समाज में समानता और न्याय की स्थापना थी। उनका यह कदम भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है, जो यह दर्शाता है कि वे अपने आदर्शों के लिए किसी भी पद को त्याग सकते थे। नेहरू मंत्रिमंडल से अलग होकर बाबा साहब अंबेडकर ने 1952 के आम चुनाव में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव बॉम्बे से लड़ा वे इस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी नारायण काजोलकर से चुनाव हार गए, काजो लकर पहले डॉ. अंबेडकर के सहयोगी रह चुके थे, जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें बाबा साहब अम्बेडकर के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने के लिए तैयार किया और स्वयं नेहरू जी उनके प्रचार में गए इसलिए यह हार और भी उल्लेखनीय मानी जाती है। इसके बाद 1954 में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने एक उपचुनाव (भंडारा लोकसभा सीट) से भी चुनाव लड़ा, लेकिन वहाँ भी उन्हें सफलता नहीं मिली।
हालाँकि वे चुनाव हार गए, लेकिन उनकी राजनीतिक और बौद्धिक शक्ति कम नहीं हुई। बाद में 3 अप्रैल 1952 को पहली बार वह राज्यसभा के सदस्य बने यहां भी कांग्रेस उनके विरोध में खड़ी रही पर शेड्यूल कास्ट फेडरेशन और कुछ निर्दलीय सदस्यों के समर्थन से वह निर्वाचित हो सके और विचारों के माध्यम से देश की नीतियों को प्रभावित करते रहे। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का मानना था कि हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था गहराई से जुड़ी हुई है, जिससे समानता संभव नहीं है। अनेक विचार विमर्श के पश्चात 1956 में उन्होंने अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म को अपनाया ,उस समय जब यह खबर हैदराबाद के निज़ाम मीर उस्मान अली खान को मिली कि डॉक्टर अंबेडकर हिन्दू धर्म को छोड़कर अन्य धर्म अपनाने जा रहे हैं तो उन्होंने बाबा साहब को इस्लाम धर्म अपनाने के लिए प्रस्ताव भेजा और 25 करोड़ रुपए की भारी भरकम रकम की पेशकश की निज़ाम चाहते थे कि बाबा साहब अंबेडर के साथ उनके अनुयाई भी इस्लाम अपना ले जिससे हैदराबाद में मुस्लिम आबादी बढ़ सके।
बाबा साहब ने इन प्रलोभनों को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि धर्म परिवर्तन से "राष्ट्रीय अस्थिरता हो सकती है और वे भारत की मूल संस्कृति से दूर नहीं जाना चाहते" बाबा साहब ने बाद में हैदराबाद के दलित समुदाय को लिखा था अत्याचार सहें लेकिन किसी भी स्थिति में धर्म न बदलें। उनकी विचारधारा मानवता, समानता और न्याय पर आधारित थी। वे तर्क और विज्ञान में विश्वास रखते थे और अंधविश्वासों के खिलाफ थे।6 दिसंबर 1956 को बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर का निधन हो गया। उन्हें 1990 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इस सम्मान के लिए भी बाबा साहब को मृत्यु के पश्चात 44 वर्ष इंतजार करना पड़ा, जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री रहते हुए ही 1955 में भारत रत्न मिल गया,इंदिरा गांधी को भी प्रधानमंत्री रहते हुए 1971 में भारत रत्न मिल गया ,राजीव गांधी को मृत्यु के तुरन्त बाद भारत रत्न दे दिया गया यदि उनकी दुर्भाग्य पूर्ण मृत्यु न होती तो शायद उनको भी प्रधानमंत्री रहते हुए ही भारत रत्न मिल जाता लेकिन कांग्रेस की किसी भी सरकार ने संविधान निर्माता बाबा साहब अम्बेडकर को भारत रत्न देने का विचार नहीं किया। 1990 में जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के समर्थन वाली विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी तब बाबा साहब अम्बेडकर को भारत रत्न सम्मान दिया गया जिसके वह वास्तविक हकदार थें । भारतीय जानता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और भारत के प्रधानमंत्री रहे स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी बाबा साहब अम्बेडकर के प्रति गहरा सम्मान रखते थे वे उन्हें भारत के महान राष्ट्रनिर्माताओं में से एक मानते थे उनके विचारों में अंबेडकर जी के प्रति आदर, सामाजिक न्याय की स्वीकृति और संविधान के प्रति सम्मान स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अटल जी ने डॉ. अंबेडकर को भारतीय संविधान का मुख्य शिल्पकार मानते हुए कहा कि उनका योगदान भारत के लोकतंत्र की मजबूत नींव है। उनके अनुसार, अंबेडकर ने ऐसा संविधान बनाया जो देश की विविधता को एकता में बांधता है। वाजपेयी जी मानते थे कि डॉ. अंबेडकर ने समाज के सबसे कमजोर और वंचित वर्गों को सम्मान दिलाने के लिए आजीवन संघर्ष किया। उन्होंने अंबेडकर को “सामाजिक क्रांति का अग्रदूत” बताया। अटल जी के भाषणों में यह बात अक्सर आती थी कि डॉ. अंबेडकर का सपना एक ऐसे भारत का था जहाँ किसी के साथ भेदभाव न हो। वे कहते थे कि अंबेडकर का संदेश केवल एक वर्ग के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए है। वाजपेयी जी ने बार-बार यह जोर दिया कि भारतीय लोकतंत्र की सफलता में डॉ. अंबेडकर की दूरदृष्टि का बड़ा योगदान है।
वे मानते थे कि संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा है—और इसमें अंबेडकर का योगदान अमूल्य है। अनुसूचित जाति एवं जनजाति को न्याय मिले उनका जीवन स्तर और ऊंचा उठे इसी उद्देश्य से अटल जी की सरकार में मई 1998 में सामाजिक न्याय एवं एवं अधिकारिता मंत्रालय तथा 1999 जनजातीय कार्य मंत्रालय का पृथक से गठन किया गया।। बाबा साहब भीमराव अंबेडकर से जुड़े पंचतीर्थ उनके जीवन के 5 प्रमुख स्थान हैं—महू (जन्मभूमि), लंदन (शिक्षाभूमि), नागपुर (दीक्षाभूमि), दिल्ली (महापरिनिर्वाण भूमि), और मुंबई (चैत्यभूमि)। कांग्रेस की सरकारों के दौरान बाबा साहब अम्बेडकर से जुड़े यह स्थल सदैव उपेक्षित रहे 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की की सरकार बनने के बाद इन स्थलों का विकास 2016 से प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा बाबा साहेब की 125वीं जयंती के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि देने और विरासत को सहेजने के लिए किया गया। यह पंचतीर्थ हैं जन्मभूमि - महू (मध्य प्रदेश): बाबा साहेब का जन्म 14 अप्रैल 1891 को यहां हुआ था यहाँ भव्य स्मारक का विकास किया गया, जिसका निर्माण कार्य 14 अप्रैल 1991 मध्यप्रदेश में भाजपा की सुंदरलाल पटवा की सरकार के दौरान हुआ था 1992 में उत्तरप्रदेश में तथाकथित बावरी ढांचा (जो की वास्तव में राम मंदिर था जहां अब रामलला विराजमान हैं) के विध्वंश के बाद केन्द्र की कांग्रेस सरकार द्वारा देश की चार राज्यों की भाजपा सरकारों को भंग कर दिया गया बाद में हुए चुनाव में मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में बनी जो लगातार 10 साल तक चली इन 10 सालों में बाबा साहब अम्बेडकर की जन्मभूमि पूरी तरह उपेक्षित रही और निर्माण कार्य बंद रहा 2003 में मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद 2005 से यहां भव्य स्मारक बनाने का काम मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ एवं निर्माण कार्य पूर्ण होने के बाद यहां प्रतिवर्ष 14 अप्रैल बाबा साहब की जयंती के दिन अंबेडकर महाकुंभ भी प्रारंभ हुआ जिसमें लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष आते हैं शिक्षाभूमि - लंदन (यूके): लंदन में वह घर जहाँ डॉ. अंबेडकर ने पढ़ाई के दौरान निवास किया था, भारत सरकार ने उसे खरीदकर स्मारक/संग्रहालय के रूप में विकसित किया।
दीक्षाभूमि - नागपुर (महाराष्ट्र): यहाँ 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया था। यहाँ एक भव्य स्तूप स्थित है, जिसे विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है। महापरिनिर्वाण भूमि - दिल्ली: 26 अलीपुर रोड स्थित इस स्थान पर 6 दिसंबर 1956 को उन्होंने प्राण त्यागे थे। इसे स्मारक के रूप में दिसंबर 2003 में राष्ट्र को समर्पित किया गया। चैत्य भूमि - मुंबई (महाराष्ट्र): दादर में स्थित यह स्थल उनका अंतिम संस्कार स्थल है। यहाँ इंदु मिल की जमीन पर स्मारक का निर्माण किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 में इन स्थलों को 'पंचतीर्थ' के रूप में विकसित करने की पहल की। इसके अलावा, लंदन के स्मारक का उद्घाटन 14 नवंबर 2015 को किया गया। 2023 में, इन पाँचों स्थानों को मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों की तीर्थ-दर्शन योजनाओं से भी जोड़ा गया। प्रधानमंत्री मोदी ने डॉ. अंबेडकर को भारतीय संविधान का निर्माता बताते हुए कहा है कि उनका बनाया संविधान भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूत नींव है।वे अक्सर कहते हैं कि संविधान देश की एकता, अखंडता और लोकतंत्र का आधार है। भारत का प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद नरेन्द्र मोदी जी का संसद की चौखट को दंडवत प्रणाम करना ,संविधान दिवस पर संविधान को शीश नवाकर प्रणाम करना यह देश की संवैधानिक व्यवस्था के साथ साथ बाबा साहब अंबेडकर को भी श्रद्धांजलि थी।
मोदी जी कहते हैं कि , डॉ. अंबेडकर ने जीवनभर दलितों, वंचितों और पिछड़ों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। वे उन्हें “सामाजिक न्याय का महान योद्धा” और “गरीबों की आवाज़” बताते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की सरकार का मंत्र “सबका साथ, सबका विकास” डॉ. अंबेडकर के समानता और समावेश के विचारों से प्रेरित है। वे मानते हैं कि अंबेडकर का सपना एक ऐसे भारत का था जहाँ हर व्यक्ति को समान अवसर मिले। मोदी जी ने यह भी कहा है कि डॉ. अंबेडकर केवल सामाजिक सुधारक ही नहीं, बल्कि एक महान अर्थशास्त्री भी थे। वे उनकी आर्थिक सोच—जैसे वित्तीय स्थिरता और संस्थागत विकास—को आज भी प्रासंगिक मानते हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के अनुसार, डॉ. अंबेडकर का जीवन संघर्ष, शिक्षा और आत्मविश्वास का उदाहरण है। वे युवाओं को उनके जीवन से सीख लेने के लिए प्रेरित करते हैं। नरेन्द्र मोदी के विचारों में डॉ. भीमराव अंबेडकर के प्रति गहरा सम्मान और श्रद्धा स्पष्ट दिखाई देती है। वे उन्हें संविधान निर्माता, सामाजिक न्याय के प्रतीक और आधुनिक भारत के प्रेरणास्रोत के रूप में देखते हैं।मोदी जी अंबेडकर जी के विचारों को वर्तमान भारत के विकास और भविष्य के मार्गदर्शन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं। बाबा साहब अंबेडकर विचारों का मूल आधार समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय था। उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों और गहन अध्ययन के आधार पर समाज को दिशा देने वाले अनेक सिद्धांत दिए। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर का मानना था कि शिक्षा ही व्यक्ति को सशक्त बनाती है। उनका प्रसिद्ध नारा था—
“शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो।” वे कहते थे कि बिना शिक्षा के समाज का उत्थान संभव नहीं है।
बाबा साहब जाति प्रथा और छुआछूत के कट्टर विरोधी थे।
उनका मानना था कि जब तक समाज में समानता नहीं होगी, तब तक सच्चा लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सकता। उन्होंने कहा था— “जाति प्रथा समाज को कमजोर करती है।” बाबा साहब डॉ.भीमराव अंबेडकर के अनुसार लोकतंत्र केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी सफल होगा जब समाज में समानता और भाईचारा होगा। उन्होंने भारतीय संविधान के माध्यम से सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए। उनका विश्वास था कि कानून के जरिए समाज में न्याय स्थापित किया जा सकता है। डॉ. अंबेडकर महिलाओं की समानता के प्रबल समर्थक थे।
उन्होंने महिलाओं को संपत्ति, शिक्षा और स्वतंत्रता के अधिकार देने पर जोर दिया। भारत से तीन तलाक जैसी कुप्रथा को समाप्त कर नरेन्द्र मोदी जी की सरकार ने देश के महिला असमानता के कलंक को खत्म किया एवं बाबा साहब अम्बेडकर के महिला समानता के स्वप्न को साकार किया।
वे एक महान अर्थशास्त्री भी थे।
उनका मानना था कि आर्थिक असमानता को खत्म किए बिना सामाजिक समानता संभव नहीं है। उन्होंने राज्य के हस्तक्षेप और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण की वकालत की। डॉ. अंबेडकर तर्क और मानवता में विश्वास करते थे। उन्होंने अंततः बौद्ध धर्म अपनाया क्योंकि उसमें समानता और करुणा का भाव है। उन्होंने सिखाया कि व्यक्ति को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना चाहिए और आत्मसम्मान बनाए रखना चाहिए।
वे अन्याय के खिलाफ खड़े होने के पक्षधर थे। डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे। उन्होंने एक ऐसे समाज की कल्पना की थी जहाँ हर व्यक्ति को समान अवसर और सम्मान मिले। उनके विचार हमें एक न्यायपूर्ण, समतामूलक और सशक्त भारत बनाने की प्रेरणा देते हैं। वह भारत माता के सच्चे सपूत एवं सामाजिक समरसता के अमर पुरोधा थे।। आज भी उनके विचार और सिद्धांत समाज के लिए मार्गदर्शक हैं। उन्होंने जो संविधान बनाया, वही भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव है। डॉ. भीमराव अंबेडकर का जीवन हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी संघर्ष और शिक्षा के माध्यम से महान उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं। उन्होंने न केवल दलितों के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए समानता और न्याय का मार्ग प्रशस्त किया।
बाबा साहब के सामाजिक समानता के लक्ष्य को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की सरकार द्वारा सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में कई योजनाएँ लागू की गई हैं। “स्टैंड अप इंडिया”, “प्रधानमंत्री आवास योजना”, “जन धन योजना” जैसी पहलें समाज के कमजोर वर्गों को मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य कर रही हैं। ये योजनाएँ अंबेडकर के उस विचार को आगे बढ़ाती हैं जिसमें आर्थिक आत्मनिर्भरता को सामाजिक सम्मान का आधार माना गया है। शिक्षा के क्षेत्र में भी सरकार ने विशेष ध्यान दिया है। अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के लिए छात्रवृत्ति योजनाओं का विस्तार, उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण की प्रभावी व्यवस्था, और कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को सशक्त बनाया जा रहा है। यह प्रयास अंबेडकर के उस विश्वास को साकार करता है कि “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो”।
इसके अलावा, संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए “संविधान दिवस” का आयोजन भी एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे नागरिकों में अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूकता बढ़ती है और लोकतंत्र की जड़ों को मजबूती मिलती है। पिछड़े वर्ग के हितों की रक्षा के लिए वर्ष 2018 में पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने का काम भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की सरकार ने किया है।
वर्ष 2021 में भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव के रूप में मनाने एवं इस दिन शासकीय अवकाश की घोषणा पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान देने वाले नायकों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की है देश के स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय बंधुओं का योगदान अग्रणी है और देश उनका ऋणी है हम महापुरुषों का सम्मान कर उनका यह ऋण चुकाने का कार्य करेंगे ,बाबा साहब ने भी इसी समानता के भाव की कल्पना की थी। टंट्या मामा,भीमा नायक जैसे अनेक क्रांति नायक जिन्हें इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला उन सब नायकों को सम्मान देने का काम भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की सरकार ने किया है।
मध्यप्रदेश के सागर में 100 करोड़ की लागत से संत रविदास का स्मारक, काशी के मगहर में संत कबीरदास का स्मारक,वर्ष 2022 में असम के जनजाति योद्धा लाचित बर्फुकन के 400 वर्ष स्मृति समारोह एवं 2024 में असम के जोरहाट में उनकी 125 ऊंची प्रतिमा(स्टेच्यु ऑफ बेलोर) की स्थापना कर जनजातीय महानायक को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।देश के राष्ट्रपति के रूप में पहले दलित समाज से आने वाले राम नाथ कोविंद जी को और दूसरी बार आदिवासी समाज से आने वाली श्रीमती द्रोपति मुर्मू जी को भारत का राष्ट्रपति निर्वाचित करवा कर भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी जी ने देश के दलितो , पिछड़ों आदिवासियों महिलाओं के मन में एक विश्वास उत्पन्न किया है कि बाबा साहब अम्बेडकर के समानता के सपने को नरेन्द्र मोदी जी की सरकार अवश्य पूर्ण करेगी। वर्ष 2023 में नरेन्द्र मोदी सरकार ने "नारी शक्ति वंदन अधिनियम" पारित कर विधायिका में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया है आने वाले दिनों में संसद के विशेष सत्र के बाद यह निर्णय की ओर बढ़ेगा और आने वाले समय देश के सभी सदनों में मातृ शक्ति बड़ी संख्या में देश की निर्णायक शक्ति बनेगी,इससे पूर्व मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार भी स्थानीय निकायों में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण का निर्णय कर मातृशक्ति को सम्मान और स्थान दे चुकी है। महिलाओं के लिए जननी एक्प्रेस,जननी सुरक्षा योजना ,गांव की बेटी योजना,प्रतिभा किरण योजना,लाडली लक्ष्मी योजना ,लाडली बहिना योजना, और अब लखपति दीदी जैसी योजना जो महिलाओं का आर्थिक स्तर ऊंचा कर उन्हें समाज में बराबरी का स्थान दिला रही हैं।।
महिला समानता का इससे श्रेष्ठ उदाहरण इससे पूर्व कभी देखा नहीं गया यह बाबा साहब के सपनों को पूरा करने का संकल्प ही तो है। 2024 में तीसरी बार प्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की सरकार ने बाबा साहब अम्बेडकर की जयंती को देश भर में "समानता दिवस" के रूप में मनाने एवं इस दिन सार्वजनिक अवकाश की घोषणा भी जिसे 2025 के 14 अप्रैल से लागू किया गया।।
नरेंद्र मोदी जी की सरकार बाबा साहब अंबेडकर की विरासत को केवल स्मारकों तक सीमित नहीं रख रही, बल्कि उसे नीतियों और कार्यक्रमों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास कर रही है।
"सबके साथ सबका विकास और सबका प्रयास" के मूल मंत्र के साथ सामाजिक न्याय, समान अवसर और सशक्तिकरण की दिशा में उठाए गए ये कदम बाबा साहब अंबेडकर के सपनों के भारत की ओर एक महत्वपूर्ण पहल हैं। बाबा साहब अंबेडकर का जीवन और कार्य हमें यह प्रेरणा देते हैं कि हम एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहां सभी को समान अवसर और सम्मान मिले। डॉ. अंबेडकर मां भारती के अमर सपूत थे वह सामाजिक समरसता के अमर पुरोधा थे ,भारत के इतिहास में वह एक अमर नायक के रूप में सदैव याद किए जाएंगे।
- सुरेन्द्र शर्मा
प्रदेश उपाध्यक्ष
भारतीय जनता पार्टी मध्यप्रदेश
संभाग प्रभारी
भाजपा निमाड़ संभाग

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