निर्मला सप्रे: कांग्रेस की 'विधायक' या भाजपा की 'वोटर'? राज्यसभा चुनाव तय करेगा बीना का सियासी भविष्य
भोपाल/बीना।
मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों बीना विधायक निर्मला सप्रे का नाम एक अनसुलझी पहेली बन गया है। तकनीकी रूप से कांग्रेस विधायक, लेकिन व्यवहार में भाजपा की सक्रिय सदस्य—सप्रे की इस 'डबल रोल' वाली राजनीति का असली इम्तिहान आगामी राज्यसभा चुनाव में होने जा रहा है। यह चुनाव न केवल उनकी निष्ठा तय करेगा, बल्कि उनकी विधायकी के भविष्य पर भी मुहर लगाएगा।
राज्यसभा चुनाव: जहाँ 'दिखाकर' डालना होगा वोट
राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया अन्य चुनावों से अलग होती है। यहाँ ओपन बैलेट सिस्टम (खुला मतदान) होता है, जिसमें विधायक को अपना वोट डालने से पहले अपनी पार्टी के अधिकृत एजेंट (पोलिंग एजेंट) को दिखाना अनिवार्य है।
पेंच यहाँ है: यदि निर्मला सप्रे भाजपा उम्मीदवार को वोट देती हैं, तो उन्हें अपना बैलेट पेपर कांग्रेस के एजेंट को दिखाना होगा। ऐसा करते ही उनकी 'क्रॉस वोटिंग' जगजाहिर हो जाएगी।
कानूनी कवच: राहत की बात यह है कि राज्यसभा में पार्टी का 'व्हिप' लागू नहीं होता, इसलिए भाजपा को वोट देने पर उनकी सदस्यता तुरंत रद्द नहीं होगी, लेकिन यह दल-बदल कानून के तहत उनके खिलाफ एक पुख्ता सबूत बन जाएगा।
हाईकोर्ट में 'कांग्रेस की सदस्य', सड़क पर 'भाजपा के साथ'
निर्मला सप्रे की सदस्यता को लेकर कानूनी लड़ाई दिलचस्प मोड़ पर है। हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान उनके वकील ने उन्हें 'कांग्रेस का सदस्य' बताया है। वहीं, दूसरी ओर बीना की सड़कों पर लगे पोस्टरों से कांग्रेस के हाथ का पंजा गायब है और वहां प्रधानमंत्री मोदी व सीएम मोहन यादव की तस्वीरें चमक रही हैं। 20 अप्रैल को होने वाली सुनवाई में कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि निर्मला ने भाजपा का दामन थाम लिया है।
बीना का 'साइलेंट' जनसंपर्क कार्यालय
विधायक के जनसंपर्क कार्यालय पर न तो कांग्रेस का झंडा है और न ही भाजपा का। बैनर-पोस्टरों पर सिर्फ 'विधायक निर्मला सप्रे' लिखा है। जानकारों का मानना है कि यह एक 'सेफ गेम' है। यदि वे खुद को भाजपा का घोषित करती हैं, तो उपचुनाव का खतरा बढ़ जाएगा और कांग्रेस के टिकट पर मिली जीत को भाजपा के पाले में ले जाना जनता के बीच जोखिम भरा हो सकता है।
जनता के मन में क्या?
बीना की जनता इस सियासी खींचतान से हैरान भी है और परेशान भी:
नाराजगी: कुछ मतदाताओं का मानना है कि उन्होंने 'पंजे' को वोट दिया था, भाजपा को नहीं। पार्टी बदलना जनादेश का अपमान है।
मजबूरी: कुछ लोग इसे 'विकास की मजबूरी' मान रहे हैं। उनका कहना है कि सत्ताधारी दल (भाजपा) के साथ रहने से क्षेत्र के अटके काम पूरे होंगे।
कन्फ्यूजन: स्थिति यह है कि कुछ लोग तो अब भी उन्हें भाजपा का ही प्रत्याशी मान रहे हैं, जबकि वे कांग्रेस के टिकट पर जीती थीं।
क्या है आगे का रास्ता?
मध्य प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले इस मुकाबले में तीसरी सीट पर भाजपा की नजरें टिकी हैं। यदि निर्मला सप्रे भाजपा के पक्ष में मतदान करती हैं, तो कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका होगा। अंतिम फैसला विधानसभा अध्यक्ष और अदालत के सबूतों पर निर्भर करेगा।

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